शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

सिविल सेवा परीक्षा के लिए हिंदी भाषा और साहित्य वैकल्पिक विषय का पाठ्यक्रम

सिविल सेवा परीक्षा के लिए हिंदी भाषा और साहित्य वैकल्पिक विषय का पाठ्यक्रम

मुख्य परीक्षा में हिंदी वैकल्पिक विषय के 250 अंकों के दो पत्र (कुल 500 अंक )हैं | पहला पत्र हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास पर केन्द्रित है | दूसरे पत्र में हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं की कृतियों का आस्वादन और उनपर केन्द्रित सवाल पूछे जायेंगे |

हिंदी प्रश्नपत्र 1
(उत्तर हिंदी में लिखने होंगे )
खंड 'क'
1.हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि का इतिहास

१)अपभ्रंश, अवहट्ट एवं आरम्भिक हिंदी का व्याकरणिक एवं अनुप्रयुक्त स्वरुप
२)मध्यकाल में ब्रज एवं अवधी का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास
३)सिद्धनाथ साहित्य, खुसरो, संत साहित्य, रहीम आदि कवियों एवं दक्खिनी हिंदी में खड़ी बोली हिंदी का प्रारंभिक स्वरुप
४)उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली और नागरी लिपि का विकास
५)हिंदी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण
६)स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का विकास
७)भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी का विकास
८)हिंदी भाषा का वैज्ञानिक और तकनीकी विकास
९)हिंदी की प्रमुख बोलियां और उनका परस्पर सम्बन्ध
१०)नागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ और उसके सुधार के प्रयास तथा मानक हिंदी का स्वरुप
११)मानक हिंदी की व्याकरणिक संरचना

खंड 'ख'
2. हिंदी साहित्य का इतिहास 
१)हिंदी साहित्य की प्रासंगिकता और महत्त्व तथा हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा
 २) हिंदी साहित्य के इतिहास के निम्नलिखित चार कालों की साहित्यिक प्रवृतियाँ
क) आदिकाल- सिद्ध, नाथ एवं रासो साहित्य
    प्रमुख कवि- चंदरवरदाई, खुसरो, हेमचन्द्र, विद्यापति
ख) भक्तिकाल- संत काव्यधारा, सूफी काव्यधारा, कृष्णभक्तिधारा एवं रामभक्तिधारा
     प्रमुख कवि- कबीर, जायसी, सूर एवं तुलसी
ग) रीतिकाल- रीतिकाव्य, रीतिबद्ध काव्य एवं रीतिमुक्त काव्य
     प्रमुख कवि- केशव, बिहारी, पद्माकर एवं घनानंद
घ) आधुनिक काल
   *नवजागरण, गद्य का विकास, भारतेंदु मंडल
   *प्रमुख लेखक- भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट एवं प्रताप नारायण मिश्र
   *आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख प्रवृतियाँ : छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, नवगीत,       समकालीन कविता और जनवादी कविता
 प्रमुख कवि- मैथिलीशरण गुप्ता, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन

३) कथा साहित्य 
 क)उपन्यास और यथार्थवाद
 ख)हिंदी उपन्यासों का उद्भव और विकास
 ग) प्रमुख उपन्यासकार - प्रेमचंद, जैनेन्द्र, यशपाल, रेणु एवं भीष्म साहनी

 घ) हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
 ड.)प्रमुख कहानीकार - प्रेमचंद, प्रसाद, अज्ञेय, मोहन राकेश एवं कृष्णा सोबती

४) नाटक और रंगमंच
 क)हिंदी नाटक का उद्भव और विकास
 ख) प्रमुख नाटककार - भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, जगदीश चन्द्र माथुर, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश
 ग) हिंदी रंगमंच का विकास

५) आलोचना 
 क)हिंदी आलोचना का उद्भव एवं विकास
   सैधांतिक, व्यवहारिक, प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी एवं नयी आलोचना
  ख) प्रमुख आलोचक- रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास वर्मा एवं नगेन्द्र

६) हिंदी गद्य की अन्य विधाएँ 
  ललित निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा-वृतांत




प्रश्न पत्र -2
(उत्तर हिंदी में लिखने होंगे )

इस प्रश्न पत्र में निर्धारित मूल पाठ्य पुस्तकों को पढना अपेक्षित होगा और ऐसे प्रश्न पूछे जायेंगे जिससे अभ्यर्थी की आलोचनात्मक क्षमता की परीक्षा हो सके |

खंड 'क' 
(पद्य )
1. कबीर : कबीर ग्रंथावली, संपादक श्यामसुंदर दास (आरंभिक 100 पद )
2. सूरदास: भ्रमरगीत सार, संपादक रामचंद्र शुक्ल (आरंभिक 100 पद )
3. तुलसीदास: रामचरितमानस (सुंदर कांड)
                      कवितावली (उत्तरकाण्ड )
4. जायसी : पद्मावत, संपादक श्यामसुंदर दास (सिंघल द्वीप खंड एवं नागमती वियोग खंड)
5. बिहारी : बिहारी रत्नाकर, संपादक जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर ( आरंभिक 100 दोहे )
6. मैथिली शरण गुप्त : भारत भारती
7. जयशंकर प्रसाद : कामायनी (चिंता और श्रद्धा सर्ग )
8. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला : राग-विराग, संपादक रामविलास शर्मा ('राम की शक्ति पूजा' और 'कुकुरमुत्ता' )
9. रामधारी सिंह दिनकर : कुरुक्षेत्र
10. अज्ञेय : आँगन के पार द्वार (असाध्य वीणा )
11. मुक्तिबोध : ब्रह्मराक्षस
12. नागार्जुन : बादल को घिरते देखा है, अकाल के बाद, हरिजन गाथा


खंड 'ख'
(गद्य)
1. भारतेंदु : भारत दुर्दशा
2. मोहन राकेश : आषाढ़ का एक दिन
3. रामचंद्र शुक्ल : चिंतामणि (भाग 1)- 'कविता क्या है' , 'श्रद्धा और भक्ति'
4. डॉ सत्येन्द्र : निबंध निलय - बालकृष्ण भट्ट, प्रेमचंद, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा,     अज्ञेय, कुबेर नाथ राय
5. प्रेमचंद : गोदान
                प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ट कहानियां, संपादक अमृत राय / मंजूषा- प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां,                           संपादक अमृत राय
6.जयशंकर प्रसाद : स्कंदगुप्त
7.यशपाल : दिव्या
8. फणीश्वर नाथ रेणु : मैला आँचल
9. मन्नू भंडारी : महाभोज
10.राजेंद्र यादव : एक दुनिया समानांतर( सभी कहानियां)

आशा है कि हिंदी भाषा एवं साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में रखने वाले अभ्यर्थी इससे लाभान्वित होंगे | हिंदी भाषा एवं साहित्य वैकल्पिक विषय की तैयारी के बारे में अपने अनुभव और मार्गदर्शन को लेकर मैं शीघ्र ही हाजिर होऊंगा |
----केशवेन्द्र कुमार आईएएस ----

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

हिंदी माध्यम में सिविल सेवा की स्तरीय किताबों की तलाश

सिविल सेवा की तैयारी हिंदी माध्यम से करने वाले अभ्यर्थियों के सामने सबसे बड़ा सवाल किताबों की उपलब्धता का होता है | सामान्य अध्ययन के लिए तो अब ढेर सारी स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध हैं मगर वैकल्पिक विषय में अच्छी किताबों के चयन में छात्रों को परेशानी आती है | वैसे भी अच्छी पुस्तकें तलाशनी पड़ती है | एक ही विषय पर उपलब्ध ढेर सारी किताबों में से आपके लिए कौन सबसे अच्छी रहेगी, ये तो आपको खुद ही जांचना-परखना पड़ेगा |

इस आलेख में मैं आपके साथ हिंदी माध्यम में उपलब्ध विभिन्न प्रकाशनों की स्तरीय किताबें शेयर करने की विनम्र कोशिश कर रहा हूँ | हिंदी माध्यम में उपलब्ध पुस्तकों की विषयवार सूची का अभाव इस आलेख की प्रेरणा है | आप सभी अभ्यर्थी भी विषयवार पुस्तकों के बारे में अपने सुझाव और अनुभव यहाँ बांट सकते हैं |

साथ ही आप सबों को मेरी सलाह रहेगी कि पुस्तक मेलों और अपने आस-पास उपलब्ध अच्छे पुस्तकालयों का जमकर प्रयोग करें | एक ही विषय पर दो-तीन लेखकों को पढना आपके ज्ञान और विचार को गहराई और गंभीरता देगा |

१. हिंदी माध्यम क्रियान्वयन निदेशालय की पुस्तकें -
दिल्ली विश्वविद्यालय के इस अंग ने हिंदी माध्यम में स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध करने में अहम् भूमिका निभायी है | मानविकी के लगभग सारे विषयों में इनकी स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध हैं | खासकर इतिहास और राजनीति शास्त्र विषय में इनकी पुस्तकों का जवाब नहीं |
इनकी नई पुस्तक सूची के लिए इस लिंक को खोले-
http://www.du.ac.in/index.php?id=110

इस प्रकाशन की सबसे उल्लेखनीय पुस्तकें हैं-
इतिहास वैकल्पिक विषय
आधुनिक विश्व का इतिहास - लालबहादुर वर्मा
प्राचीन भारत का इतिहास - झा एवं श्रीमाली
मध्यकालीन भारत भाग एक एवं दो- संपादक हरिश्चंद्र वर्मा
आधुनिक भारत का इतिहास- संपादक रामलखन शुक्ल
(इतिहास खंड की अन्य पुस्तकें भी इस विषय की गहन तैयारी के लिए देखी जा सकती है |)
राजनीति विज्ञान वैकल्पिक विषय हेतु 
राजनीति सिद्धांत -संपादक ज्ञान सिंह संधू
बदलती दुनिया में भारत की विदेश नीति भाग एक एवं दो - वी पी दत्ता
भारत में उपनिवेशवाद एवं राष्ट्रवाद- संपादक हिमांशु राय
संयुक्त राष्ट्र संघ - नीना शिरीष
नारीवादी राजनीति- संघर्ष एवं मुद्दे - संपादक- साधना, विवेदिता एवं जिनी
पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन - सुब्रत मुख़र्जी एवं सुशीला रामास्वामी
भारतीय संसद-समस्याएँ एवं समाधान - सुभाष कश्यप
सामान्य अध्ययन हेतु
आजादी के बाद का भारत - विपिन चन्द्र, मृदुला मुख़र्जी, आदित्य मुख़र्जी

२. इग्नू की BA एवं MA की पुस्तकें
 सिविल सेवा के वैकल्पिक विषयों की हिंदी माध्यम में तैयारी के लिए इग्नू के पुस्तकों की महत्ता सर्वविदित है | विषय विद्वानों की उत्कृष्ट टीम द्वारा तैयार किये गए इनकी किताबें सिविल सेवा की तैयारी के बिंदु से काफी महत्त्वपूर्ण है | साथ ही हर विषय की पुस्तिका में उस विषय के सारे उत्कृष्ट सन्दर्भ ग्रंथों की सूची उपलब्ध है | इग्नू की पुस्तकें आप इग्नू के दिल्ली ऑफिस से खरीद सकते हैं | इग्नू की पुस्तकें पीडीऍफ़ फॉर्मेट में इन्टरनेट पर फ्री उपलब्ध है | लिंक है -
http://www.egyankosh.ac.in/

3. एस. चाँद प्रकाशन की पुस्तकें -
 इस प्रकाशन ने सामान्य अध्ययन और सी सैट पेपर के लिए हिंदी माध्यम में काफी अच्छी पुस्तकें प्रकाशित की है | यशपाल एवं ग्रोवर की 'आधुनिक भारत का इतिहास' जैसी पुस्तकों ने तो वाकई इतिहास ही रचा है | पुस्तक सूची के लिए लिंक देखे -
http://www.schandgroup.com

सामान्य अध्ययन हेतु-
आधुनिक भारत का इतिहास - यशपाल एवं ग्रोवर
सरल अंकगणित- आर एस अग्रवाल
भारतीय अर्थव्यवस्था - अश्विनी महाजन एवं गौरव दत्त
हिंदी भाषा एवं साहित्य पत्र हेतु -
हिंदी लोकोक्तियाँ एवं मुहावरे- बाबू  गुलाब राय


4. टाटा मैकग्रा हिल प्रकाशन -
 इस प्रकाशन की हिंदी माध्यम की पुस्तकें प्रारंभिक परीक्षा एवं मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन पत्र  की तैयारी के लिए काफी उपयोगी है | लक्ष्मीकांत की राज्यव्यवस्था एवं पुष्पेश पन्त की अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध जैसी काफी अच्छी पुस्तकें इस प्रकाशन ने दी है | पुस्तक सूची के लिए इस लिंक को देखे |
http://www.tmhshop.com/test-prep/civil-service-examination-hindi

सामान्य अध्ययन पत्र हेतु-
भारतीय शासन - एम लक्ष्मीकांत
भारत एवं विश्व का भूगोल - माजिद हुसैन
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास - शीलवंत सिंह
21 वीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध - पुष्पेश पन्त
भारत की विदेश नीति- पुष्पेश पन्त

लोक प्रशासन वैकल्पिक विषय हेतु
समग्र लोक प्रशासन - माहेश्वरी
21 वीं शताब्दी में लोक प्रशासन - दुबे
प्रशासनिक विचारधाराएँ- दुबे

राजनीति विज्ञान वैकल्पिक विषय हेतु-
राजनीति विज्ञान - एन डी अरोरा

समाज शास्त्र वैकल्पिक विषय हेतु-
समाज शास्त्र - पांडे

भूगोल वैकल्पिक विषय हेतु-
भूगोल सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के लिए- खुल्लर
भौगोलिक मानचित्रावली - हुसैन



५.उपकार  प्रकाशन की पुस्तकें -
 इस प्रकाशन की पत्रिका प्रतियोगिता दर्पण ने सिविल सेवा के हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों का लम्बे समय से मार्गदर्शन किया है | इस प्रकाशन की किताबें सामान्य अध्ययन पत्र के लिए काफी उपयोगी है |
http://upkar.in/books.aspx?SCID=29

भारतीय अर्थव्यवस्था अतिरिक्तांक
कला एवं संस्कृति अतिरिक्तांक

६. प्रकाशन विभाग की पुस्तकें -
 भारत सरकार के अधीन इस संस्थान की पत्रिकाएँ योजना और कुरुक्षेत्र सिविल सेवा की तैयारी के लिए अपरिहार्य है | साथ ही इसकी कुछ अन्य पुस्तकें जैसे 'आधुनिक भारत के निर्माता' श्रृंखला की पुस्तकें, संत कवि एवं गाँधी जी से जुडी पुस्तकें  सामान्य अध्ययन और निबंध पत्र के लिए उपयोगी है |
http://www.publicationsdivision.nic.in/Hindi/380HindiBooks.pdf


७. प्रतियोगिता साहित्य प्रकाशन -
 राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, भूगोल, समाज शास्त्र, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध जैसे विषयों पर इस प्रकाशन की पुस्तकें वैकल्पिक विषय की तैयारी के साथ सामान्य अध्ययन एवं निबंध पत्र की तैयारी के लिए भी काफी उपयोगी है |
http://www.psagra.in/product-category/iaspcs-mains-exam/ias-hindi/

सामान्य अध्ययन के लिए-
भारतीय शासन एवं राजनीति - फड़िया

राजनीति विज्ञान वैकल्पिक विषय हेतु-
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति - बी एल फडिया

लोक प्रशासन वैकल्पिक विषय हेतु
भारत में लोक प्रशासन - बी एल फडिया
भारतीय प्रशासन - बी एल फडिया

समाज शास्त्र वैकल्पिक विषय हेतु-
समाज शास्त्र - प्रो.एम एल  गुप्ता एवं डॉ डी डी शर्मा

भूगोल वैकल्पिक विषय हेतु-
भारत का बृहत् भूगोल -डॉ चतुर्भुज मामोरिया


८.  अरिहंत प्रकाशन 
 इस प्रकाशन ने सामान्य अध्ययन के प्रारंभिक पत्र के लिए कुछ अच्छी पुस्तकें प्रकाशित की है | इस प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित प्रारंभिक परीक्षा के क्वेश्चन बैंक अवश्य खरीदने योग्य है |
http://www.arihantbooks.com/Store/1/5/Entrance-Exam/Civil-Services

९. सिविल सर्विसेज क्रॉनिकल 
 इस प्रकाशन की पत्रिका सिविल सेवा की तैयारी के लिए काफी उपयोगी है | इस प्रकाशन की कुछ पुस्तकें भी सामान्य अध्ययन पत्र की तैयारी के लिए काफी महत्तवपूर्ण है | इस प्रकाशन के हल किये हुए मुख्य परीक्षा के क्वेश्चन बैंक अवश्य खरीदने योग्य  है | सिविल सर्विसेज प्लानर भी नए अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी है |
http://www.chronicleindia.in/our-books

10. पुस्तक महल -
 इस प्रकाशन की हिंदी माध्यम की कुछ पुस्तकें सामान्य अध्ययन पत्र तथा आपकी हॉबी  की तैयारी के लिए उपयोगी है | हालाँकि काफी सतर्क चयन की जरुरत है क्योंकि किताबों की भरमार से उपयोगी किताब ढूँढने में काफी श्रम लगता है |
http://www.pustakmahal.com/books/

११. स्पेक्ट्रम प्रकाशन -
इस प्रकाशन की पुस्तकें सामान्य अध्ययन पत्र के लिए उपयोगी है |
http://spectrumbooks.in/books/hindi/

१२. कम्पीटीशन सक्सेस रिव्यु -
 इस प्रकाशन की पत्रिका निबंध एवं साक्षात्कार की तैयारी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है | साक्षात्कार के लिए इस प्रकाशन की पुस्तक काफी अच्छी है |
http://www.competitionreview.in/publication.php

१३. वाणी प्रकाशन
 निबंध पत्र के लिए इस प्रकाशन की पुस्तकें काफी उपयोगी है |
http://vaniprakashanblog.blogspot.in/

१४. राजकमल प्रकाशन
 हिंदी साहित्य और निबंध पत्र की तैयारी के लिए काफी उपयोगी पुस्तकें उपलब्ध |
http://www.rajkamalprakashan.com/

१५. साहित्य अकादमी -
हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इस प्रकाशन की पुस्तकें विशेषकर 'साहित्य निर्माता' सीरीज की पुस्तकें काफी काम की है |
http://sahitya-akademi.gov.in/

साथियों, हिंदी माध्यम में सिविल सेवा की तैयारी के लिए पुस्तकें प्रकाशित करने वाले प्रमुख प्रकाशकों की प्रारंभिक सूची मैंने आप लोगों के सामने अपने सीमित ज्ञान के आधार पर रखी है | कुछ अन्य महत्तवपूर्ण प्रकाशन जो यहाँ आने से रह गए हैं, उन्हें मैं  धीरे-धीरे विस्तृत विवरण के साथ आप लोगों के सामने लाने की कोशिश करूँगा | साथ ही सारे प्रकाशनों से सबसे अच्छी पुस्तकों के बारे में भी थोड़े और विस्तार से लिखूंगा | आप लोगों से भी अनुरोध है की आप अपने सुझाव भेजे |  हिंदी साहित्य के वैकल्पिक पत्र के लिए ढेर सारे साहित्यिक प्रकाशन हैं जिनकी चर्चा मैं अपने एक अलग आलेख में करूँगा |

हंस की तरह नीर-क्षीर विवेक से अपने लिए सबसे उत्तम पुस्तकों का चयन करे | अगर आपने अच्छी पुस्तकों को अपना मित्र बनाया तो जीवन भर सफलता आपकी संगिनी बनी रहेगी और आप जीवन के हर पड़ाव से हँसते-मुस्कुराते गुजरेंगे |

सफलता की शुभकामनाओं के साथ,
केशवेन्द्र कुमार, आईएएस

रविवार, 1 दिसंबर 2013

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2013- शुभकामनाएँ एवं निबंध पत्र हेतु सुझाव

कल से सिविल सेवा मुख्य परीक्षा की शुरुआत हो रही है | सबसे पहले मैं इस परीक्षा में शामिल हो रहे प्रतिभागियों को ढेर सारी शुभकामनाएँ देता हूँ और उनकी सफलता की दुआ करता हूँ | फिर कुछ आखिरी घड़ी की नसीहतें, अनुभव उनके साथ बांटना चाहूँगा |

सिविल सेवा में सफलता के लिए मुख्य परीक्षा को अच्छे अंकों से पास करना  एक तरह से निर्णायक भूमिका निभाता है | परीक्षा की इन आखिरी घड़ियों में अच्छी-से अच्छी तैयारी के बावजूद छात्र दवाब में होते हैं | 'क्या छोडू, क्या दुहराऊ' की दुविधा होती है | अपनी तैयारी के बारे में संशय होता रहता है | इस समय के लिए मेरा सुझाव यही होगा कि अपनी तैयारी के बारे में आत्मविश्वस्त रहे | महत्वपूर्ण विषयों का दोहराव करे और परिणाम की चिंता से अपने आपको दवाब में न डाले |

कल का पहला पेपर निबंध का है | इस वर्ष से निबंध के पत्र को काफी महत्त्व दिया गया है और इसके अंक बढाकर 250 कर दिए गए हैं | ऐसे में या तो 250 अंक का  एक निबंध या फिर 125 अंक के  दो निबंध लिखने को कहा जा सकता है | इस पत्र के लिए कुछ सुझाव ध्यान रखें -
* शब्द सीमा- 250 अंक के निबंध के लिए लगभग 2000 से 2500 शब्दों का निबंध लिखे |
*परीक्षा भवन के तीन घंटे में 30 मिनट का समय निबंध के विषय के चयन और उसकी रूपरेखा तैयार करने में लगाये | उत्तर पुस्तिका के आखिरी पन्ने में रफ़ में निबंध के विषय में अपने सारे ज्ञान और विचारों को क्रम बद्ध करके लिख ले | अंत में दस से पंद्रह मिनट का समय निबंध को दुहराने और भाषा या व्याकरण की गलतियों को सुधरने के लिए रखे |
*निबंध की शुरुआत आकर्षक और विषयानुकूल होनी चाहिए | अपनी मौलिकता और कल्पनाशक्ति को यहाँ अच्छे से प्रयोग करे |
*निबंध के मुख्य भाग में विषय को विस्तार दे और क्रमबद्ध तरीके से अपनी बात रखे |
*उपसंहार में अपनी बातों को तार्किक निष्कर्ष तक पहुचाये  और निबंध के निचोड़ को संक्षेप में सामने रखे |
*भाषा सहज-सरल और प्रवाहमयी हो |
*समसामयिक उदाहरणों, प्रेरक प्रसंग, प्रासंगिक लघुकथा, काव्यांश, सूक्ति-उद्धरण का समुचित प्रयोग करे | इनका प्रयोग निबंध के प्रवाह और प्रभाव को बढ़ाने वाला होना चाहिए | ऐसा नहीं लगना चाहिये की आप अपने पांडित्य का प्रदर्शन करने के लिए इन्हें ठूंसे जा रहे हैं |
*विवादस्पद विषय में संतुलित विचार रखे - विषय के दोनों पक्षों को सामने रखकर फिर अपने निष्कर्ष तर्क सहित रखे |
*संवैधानिक मूल्यों और देश के प्रति प्रेम और आदर का ध्यान रखे | आपके निबंधों का स्वर और निष्कर्ष नकारात्मक न हो, इसका भी ख्याल रखे | यदि आप किसे ऐसे विषय के बारे में लिख रहे हो जहाँ वर्तमान परिदृश्य बिलकुल नकारात्मक है, वहां भी सुधार कैसे लाया जा सकता है, उसको प्रधानता दे |

आप सबों को मेरी तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएँ |

केशवेन्द्र कुमार, आईएएस

सोमवार, 16 सितंबर 2013

चलो मनाये हिंदी दिवस को भारतीय भाषा दिवस के रूप में

हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़ों के आयोजन की औपचारिकता सारे देश में जारी है | इन औपचारिकताओं से हिंदी का कितना भला होने वाला है, यह तो इतने सालों में भी जनता की समझ में नहीं आया | राजभाषा दिवस, राजभाषा विभाग, राजभाषा आयोग- इन सारे सफ़ेद हाथियों ने हिंदी को उसकी अन्य भारतीय बहन भाषाओं से दूर ला कर खड़ा कर दिया |
 मेरी नजर में हिंदी भाषा अपनी सारी भारतीय बहन भाषाओं के साथ एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है | तकनीकी क्रांति के इस युग में एक संभावना तो यह है की ये सारी भाषाएँ शिक्षा और रोजगार की भाषा बन कर उभरे | वहीं एक संभावना यह है की अंग्रेजी का प्रभुत्त्व हिंदी के साथ-साथ सारी भारतीय भाषाओं को हाशिये पर धकेल दे | अंग्रेजी जिस तरह से शिक्षा और रोजगार की भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर रही है, उसे देखते हुए ऐसी आशंका होना लाजमी भी है |  

भाषा की राजनीति को परे रख जिस एक कदम से हम हिंदी के साथ-साथ सारी भारतीय भाषाओं को फलने-फूलने में और राष्ट्रीय एकता फ़ैलाने में मदद दे सकते हैं वो है पूरे भारत में भाषा के पठन-पाठन की त्रिभाषा प्रद्धति को लागू करना | मातृभाषा, हिंदी/भारतीय भाषा/ अंग्रेजी इस रूप में यदि तीन भाषाओं को सारे राज्य में बच्चों को पढाना अनिवार्य कर दिया जाया तो भारत की भाषा की समस्या का शाश्वत समाधान हो सकता है  यदि अहिन्दी भाषी राज्य अपने यहाँ हिंदी को बच्चों को दूसरी भाषा के रूप में  पढाये  तो उसके बदले में हिंदी भाषी राज्यों को अपने यहाँ कोई एक भारतीय भाषा बच्चों को अनिवार्य रूप से पढ़नी चाहिए | कल्पना कीजिये की यदि बिहार के बच्चे मलयालम सीखे, उत्तर प्रदेश में दूसरी भाषा के रूप में तमिल पढाई जाए, मध्य प्रदेश अपने बच्चों को तेलुगु पढाये, राजस्थान में कन्नड़ विद्यालयों में बच्चों को दूसरी भाषा के रूप में पढाई जाये और इसी भांति भारत का हर राज्य अपने बच्चों को मातृभाषा, हिंदी(हिंदी भाषी क्षेत्रों में कोई अन्य भारतीय भाषा) एवं अंग्रेजी, इन तीन भाषाओं की शिक्षा दे तो फिर हिंदी के साथ सारी भारतीय भाषाएँ भी प्रगति करेंगी और सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच की जो भाषिक खाई है, उसे भी पाटा जा सकेगा |

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद अभी वक़्त की मांग है | भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि के मौलिक लेखन के साथ विश्व की हर भाषा की उत्कृष्ट कृति के अनुवाद की व्यवस्था होनी चाहिए | साहित्यकारों को उनका समुचित सम्मान मिलना चाहिए | जिस भाषा के साहित्यकार हाशिये पर धकेले जाते हो, उस भाषा के दिन गिने-चुने होते हैं हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को इन्टरनेट पर भी बढ़ावा दिए जाने की जरुरत है |


मैं तो यही कहूँगा की हिंदी दिवस को हम यदि भारतीय भाषा दिवस के रूप में मानते हुए हर भारतीय भाषा की प्रगति में अपना अंशदान देने का प्रण ले, तभी हम हिंदी के साथ ही समस्त भारतीय भाषाओं के प्रति अपना कर्तव्य निभा पायेंगें |

इस अवसर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में लिखी अपनी एक पुरानी कविता आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है -


कितनी भाषाओँ से कितनी बार

कितनी भाषाओँ से कितनी बार
गुजरते हुए मैंने जाना है की
हर भाषा संजोये होती है
एक अलग इतिहास, संस्कृति और सभ्यता
की हर भाषा में उसके बोलने वालों की हर
ख़ुशी और गम का सारा हिसाब-किताब मौजूद होता है.

हर वो भाषा जो और भाषाओँ को मानती है बहन
और नही रखती उनकी प्रगति से कोई डाह-द्वेष
उनको आकर छलती है कोई साम्राज्यवादी भाषा
कहती है की अब इस भाषा में नए समय को
व्यक्त नही कर सकते, पर चिंता क्यूँ है, मैं हूँ ना!

और धीरे-धीरे इक भाषा दूसरी भाषा को
अपनी गुलामी करने को मजबूर करती है
उनको छोड़ देती है उन लोगों के लिए
जिनके मुख से अपना बोला जाना उसे नागवार है
आखिर मजदूरों, भिखारियों, आदिवासियों,
बेघरों, वेश्याओं, यतीमों, अनपढों या एक शब्द में कहे
तो हाशिये पर जीने वालों के लिए भी तो कोई
भाषा होनी चाहिए ना?

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए महसूसा है मैंने
कितनी ममता होती है हर एक भाषा में
कितनी आतुर स्नेहकुलता से अपनाती है
वो हर उस बच्चे को जो उसकी गोदी में
आ पहुंचा है बाहें पसारे, बच्चा-
जिसे अभी तक तुतलाना तक नही आता नयी भाषा में.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
मैंने महसूसा है की भाषा कभी भी
थोपकर नही सिखाई जा सकती,
जबतक अन्दर से प्रेम नही जागा हो,
भाषा जुबान पर भले चढ़े, दिल पर नही चढेगी.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
देखा है मैंने की सत्ता और बाजार ने
हर बार कोशिश की है, और अब भी कर रहे हैं
भाषा को अपना मोहरा बनाने की
पर भाषा है की हर बार आम आदमी के पक्ष में
खड़ी हो गयी इस बात की परवाह किये बिना
की कौन खडा है सामने.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
जाना है की संवाद चाहती है भाषाएँ
भाषाओँ को बोलनेवाले लोग
भाषाओँ में लिखने वाले साहित्यकार
एक-दुसरे से
पर भाषा की राजनीति करने वाले
नही चाहते ऐसा और खडा कर देते है
सगी बहन जैसी भाषाओँ को एक-दुसरे के विरूद्व
उनकी मर्जी के खिलाफ.

भाषाओँ के साथ दिक्कत यही है
की हर भाषा में चीखता हुआ इन्सान
सबसे दूर तक सुना जाता है
और अच्छे इंसानों की खामोशी बस उन्ही तक
सिमट कर रह जाती है.
भाषा को बचाए रखने के लिए
भाषा में अच्छे इंसानों की चीख अब बहुत जरुरी है.


शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

भ्रष्टाचार को भारत से भगाने के लिए फिर से एक स्वाधीनता संग्राम की जरुरत है?

 भ्रष्टाचार को भारत से भगाने के लिए फिर से एक स्वाधीनता संग्राम की जरुरत है?
 क्या भ्रष्टाचार भारत की जीन में है?


भारत को अंग्रेजों ने जितना न लूटा, उससे ज्यादा इसी देश के भ्रष्टाचारियों ने लूटा. यही वो महान देश है जहाँ  ट्रकों के पीछे कई बार हमें देखने को मिलता है-
“सौ में नब्बे बेईमान,
फिर भी मेरा देश महान |”
और, उसी ट्रक को कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई सरकारी मुलाजिम रोककर वसूली करता है. आखिर देश के नब्बे लोगों का ही तो लोकतंत्र पर ज्यादा हिस्सा है ना?

यही वो महान देश है जहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली हर उस आवाज को, जिसने धमकियों या तबादले से चुप होना स्वीकार नही किया, गोलियों की भाषा से चुप करा दिया जाता है. आखिर, ईमानदार लोग लातों के भूत होते हैं, बातों से तो वो मानने से रहे.
नहीं-नहीं, ऐसा मत सोचिये की मैं अतिशयोक्ति कर रहा हूँ, देश की हालात को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहा हूँ. यही सच है इस वक़्त का. ये वक़्त इमानदारों का नहीं. हमारे समाज ने समझदारी सीख ली है, उसने पैसे की क़द्र जान ली है. वो संस्कृत में एक कहावत है न-
“यश्यास्ति वित्तः स नरः कुलीनः |
……………………………………………….
सर्वे गुणाः कान्च्न्माश्रयन्ति |
(जिसके पास पैसा है, वह कुलीन है, वह रूपवान है, सर्वज्ञ है | वाकई, सारे गुण स्वर्ण अर्थात धन के आश्रित है |)

यही वह देश है जिसमे सत्येन्द्र दुबे जैसे होनहार ईमानदार नौजवान को राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में भ्रष्टाचार को उजागर करने पर गोलियों की सौगात मिली. आई आई टी से अच्छी डिग्री लेकर निकले इस उत्साही नौजवान ने देश की सड़कों को बदलने का सपना देखा था, अपने लिए नहीं, अपने देश-समाज के लिए. मगर कमीशनखोरों की सारी जमात ने मिलकर उस ईमान की बुलंद आवाज को सदा के लिए खामोश कर दिया. बोधगया, जहाँ पर भगवान् बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, वही पर सत्येन्द्र डूबे के बहाने ईमानदारों की सारी जमात को यह ज्ञान मिला कि इस कलयुग में ईमान का पुरस्कार गोली है. कबीर की उक्ति याद आती है-
“हम घर जाड़ा आपना, लिया लुकाठी हाथ |
जो घर जाड़े आपना, चले हमारे साथ ||
वाकई, ईमान अभी के युग में एक दोधारी तलवार के समान है जिसपर चलने की हिम्मत बिरले ही कर पा रहे हैं. अभी के युग में ईमानदार होना आश्चर्य की बात हो गयी है.
 भ्रष्टाचार का वटवृक्ष
वर्तमान भारत में देखे तो भ्रष्टाचार की शुरुआत चोटी से होती है. राजनीतिक भ्रष्टाचार सारे भ्रष्टाचार की जड़ है. यही से उगा भ्रष्टाचार का बरगद अपनी शाखाएँ फैलता हुआ सब कुछ को अपनी चपेट में ले लेता है. अभी की व्यवस्था में चुनाव के प्रबंधन में जो खामियां हैं, उसका खामियाजा सारी जनता को भुगतना पड़ता है. चुनाव के लिए ढेर सारे पैसों की जरुरत होती है जिसे जुटाने की कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं है. फलस्वरूप, राजनीतिक दल पैसेवाले बाहुबलियों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. साथ ही, कॉर्पोरेट क्षेत्र से भी उन्हें अच्छी-खासी राशि चुनाव के लिए वसूलनी होती है. फलतः, चुनाव के बाद उन्हें जिन-जिन से भरपूर चंदा मिला है, उनके हितों को जनता के हित से ऊपर प्राथमिकता देनी होती है. वर्तमान भारत में देखे तो सरकार बचाने के लिए विधायकों की खरीद-फ़रोख्त से लेकर संसद में प्रश्न पूछने के लिए पैसे लेने जैसे उदाहरणों ने इस देश में जनता के विश्वास को हिला कर रख दिया है |

भ्रष्टाचार की शुरुआत चुनाओं से होती है, बाहुबल और पैसों के प्राधान्य के कारण ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोग राजनीति से कतराने लगे हैं और इस कारण संसद से लेकर विधान सभा और विधान परिषदों तक मनी और मसल पावर वालों का बोलबाला है. ऐसी सरकारों से ईमानदारी की उम्मीद करना आकाशकुसुम मांगने जैसा है. अब जो लोग ढेर सारा पैसा खर्च करके चुनावों में जीते हैं, उन्हें अपने निवेश पर समुचित मुनाफे की उम्मीद तो रहेगी ही. ऐसे में पिसती है बेचारी जनता और निरीह ईमानदार सरकारी कर्मचारी. सरकारों के हाथ में ट्रान्सफर एक शक्तिशाली हथियार की तरह है जिसका उपयोग न झुकने वाले ईमानदार लोगों को सही राह पर लाने के लिए किया जाता है. और, फिर शंटिंग पोस्टिंग भी एक कारगर हथियार है- जो कर्मचारी ज्यादा ईमानदार होने की गफलत में उछल-कूद कर रहा हो, उसे ऐसे जगह पर पोस्ट करो जहाँ पर उसे दस बार अपने ईमानदार होने पर पुनर्विचार करना पड़े. वाकई, ईमानदार होना बड़ी बात नहीं, पर जिन्दगी भर ईमानदार बने रहना बहुत बड़ी तपस्या की तरह है- एक ऐसी तपस्या जिसकी क़द्र लोग भूल गए हैं.

नेताओं की बात तो कर ली, पर बाबू लोग भी पीछे कहाँ रहने वाले हैं. राजनीतिक भ्रष्टाचार से आम जनता का पाला प्रत्यक्ष नहीं पड़ता पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार से तो हमारा साबका गाहे-बगाहे पड़ता ही रहता है.
हर चीज की कीमत बंधी हुई है, बेईमानी इस युग का नियम है, ईमानदारी अपवाद है. तभी तो इसे शायद कलयुग की संज्ञा दी गयी है.

सरकारी दफ्तरों में चपरासी से लेकर ऊपर तक सब कुछ एक बंधे-बंधाये तरीके से होता है. ईमानदार लोग भी होते हैं, पर वो बस अपने काम में ईमानदारी दिखा पाते हैं, और ज्यादातर बेकार की जगहों में पोस्ट कर के रखे जाते हैं. ऑफिसर से मिलाने से लेकर फाइल को सबसे ऊपर रखने तक की फीस होती है. कोई ईमानदार ऑफिसर भी हो तो ज्यादातर यही होता है कि वो पैसे नही ले रहा है, पर उसके हर एक चिड़िया पर लोग पैसे बना रहे होते हैं. इस समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि लोग ईमानदारी को खुद तक ही सीमित करके संतुष्ट हो लेते हैं. ऐसे ईमानदार अधिकारी का क्या फायदा जिसका ऑफिस बेईमान हो. मेरी नज़र में ऐसी ईमानदारी छद्म ईमानदारी है, ढोंग है. ईमानदारी के लिए सबसे बड़ा खतरा वैसे ईमानदार लोग है जो अपनी ईमानदारी पर हमेशा रोते मिलते हैं.

सरकारी व्यवस्था में देखे तो कुछ सबसे ज्यादा भ्रष्ट विभागों में पुलिस, यातायात, टैक्स, राजस्व आदि आते है. पैसे की दुनिया है और यहाँ पैसा बोलता है, पैसा सुनता है. लोगों को भी अपने छोटे कामों के लिए इतनी उतावली रहती है कि लाइन को फलांगने के लिए अपनी जेब थोड़ी ढीली करना उन्हें नहीं अखरता. इस संस्कृति ने भ्रष्टाचार को और शह दी है. भ्रष्टाचार लेना-देना भी एक तरह का नशा है जो एक बार लग जाए तो फिर छूटने का नाम नहीं लेता. कई राज्यों में तो यह हाल है की पुलिस एफ आई आर लिखने के लिए दोनों पक्षों से पैसे लेती है. ऐसे में न्याय एक स्वप्न की तरह दीखता है.

सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार का विश्लेषण करे तो दो तथ्य सामने आते हैं- कुछ जगहें ऐसी है जहाँ व्यस्था जनता को भ्रष्ट तरीके अपनाने को मजबूर करती है, कुछ जगहें ऐसी है जहाँ जनता अपनी सुविधा के लिए भ्रष्ट तरीके अपनाती है तो कुछ जगहों में दोनों बाते होती है. जैसे, पहले तरीके का एक उदाहरण लेते हैं- टू जी घोटाला- यहाँ पर अपारदर्शी व्यवस्था ने घूसखोरी को बढ़ावा दिया. दूसरे तरीके का  सबसे अच्छा उदहारण वैसी सेवाएँ हैं जहाँ जनता को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है. वहां लोग अपनी जल्दी सेवा पाने के लिए थोड़े पैसे लगाने में गुरेज नही करते, खुद आगे बढ़कर पेशकश करते है. तीसरे तरीके का एक उदहारण पुलिस है. वहां एक तरफ व्यस्था कभी घूस देने पर मजबूर करती है तो कभी लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए व्यवस्था को आगे बढ़ कर घूस ले मनमाफिक काम कर देने का ऑफर देते हैं .

ऐसा नहीं है कि बेईमानी सिर्फ सरकार में ही है | बेईमानी तो हमारे समाज की रग-रग में समा चुकी है | कॉर्पोरेट और व्यापार जगत के भ्रष्टाचार के किस्से तो जगजाहिर है | हाल में ही राडिया टेप कांड से कॉर्पोरेट जगत में भ्रष्टाचार की कुरूप तस्वीर जनता के सामने आयी है | वैसे भी प्रसिद्ध व्यापारिक घरानों के टैक्स चोरी और अपना काम निकलवाने के लिए सरकार और सरकारी दफ्तरों को घूस खोर बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने से जनता भली-भांति परिचित है | छोटे स्तर पर देखे तो दुकानों में बिल न देकर सरकारी टैक्स चुराने वाले दुकानदार और थोड़ी छूट के लोभ में बिल न लेने वाली जनता भी भ्रष्ट ही हैं. भारत में हम बड़े फक्र से “जुगाड़” का जिक्र करते हैं | ये जुगाड़ ही तो भ्रष्टाचार देव का सुदर्शन चक्र है | नौकरी लगवाने से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पुलिस वेरिफिकेशन हर चीज को जल्दी करने के लिए भारत में रामबाण दवा है ‘जुगाड़’.   

भारतीय न्याय व्यवस्था को भी इस मकड़जाल को हटाने में सफलता कम ही मिली है | अब तो आलम यह है कि न्याय भी पैसे की देवी के आगे मुहताज है | भारत में न्याय व्यवस्था इतनी महँगी, समयसाध्य और दुरूह हो गयी है कि भ्रष्ट लोगों को सजा मिलने के पहले ही वो धरा धाम का सुख भोग ऊपर की और प्रस्थान कर चुके होते हैं | पिसते है गरीब लोग जिनका शिकार भ्रष्टाचार नाम का खूंखार शिकार बड़े मजे से करता है | आजाद भारत के इतिहास में देखे तो किसी बड़े भ्रष्टाचार कांड में किसी बड़े शख्श को सजा मिलने की घटनाएँ अपवाद स्वरुप ही मिलेंगी | हवाला से लेकर चारा घोटाला से लेकर बोफोर्स घोटाले और वर्त्तमान में आये तो कामनवेल्थ घोटाले हो या 2 जी घोटाला या कोयला घोटाला, मुक़दमे चलते रहते हैं, अभियुक्त सम्मानपूर्वक अपनी जिन्दगी गुजार कर इस धरती से प्रस्थान कर जाते हैं पर हमारी जांच पूरी नहीं होती या फिर सबूतों के अभाव में अभियुक्त बाइज्जत बरी कर दिया जाता है |

आशा के उजले दीप

ऐसे में लगता है कि क्या आशा एक विलुप्त चिड़िया का नाम है? मगर, घनघोर अँधेरे में भी आशा के टिमटिमाते दिए आश्वास देते हुए दिख ही जाते हैं. सूचना का अधिकार ऐसा ही एक टिमटिमाता दिया है जिसने डूबती ईमानदारी को तिनके का सहारा दिया है. इस अधिकार के आने के साथ अब लोग फाइल में सावधान रहने लगे हैं, चूँकि जनता के प्रति अब उनकी जिम्मेदारी बनती है. इस अधिकार के दायरे में अगर राजनीतिक दल, स्वयंसेवी संगठन और कॉर्पोरेट जगत को ला दिया जाये, तो वाकई नजारा ही बदला हुआ दिखेगा. खैर, वर्तमान स्वरुप में भी इस सूचना के अधिकार ने काफी हद तक पारदर्शिता और जनोन्मुख प्रशासन को बढ़ावा देने में अहम् भूमिका निभाई है.

आशा की दूसरी किरण ई –प्रशासन है. जिन –जिन सेवाओं को ई-सेवा के दायरे में लाया गया है, वहां जनता को सही समय पर बिना कोई रिश्वत दिए सेवा मिल रही है. जैसी- जैसे ई-सेवाओं का दायरा बढ़ता चलेगा, वैसे-वैसे भ्रष्टाचार मुक्त सेवाएँ पाना सुलभ होता जायेगा. उदहारण के तौर पर रेलवे आरक्षण को ई सेवा के दायरे में लाने के बाद आये बदलाव को देख सकते हैं. काफी हद तक इससे लोगों को दलालों और घूस देने की मज़बूरी से बचने में मदद मिली है. इसी प्रकार पासपोर्ट बनवाने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था ने जनता की परेशानी और भ्रष्टाचार को भी काफी हद तक नियंत्रण में लाया है |


आशा की एक और किरण लोकपाल बिल है. यदि वाकई में इस देश में सही तरीके से इस बिल को लागू किया जाये तो भ्रष्टाचारियों के मन में भय पैदा होगा और मध्यममार्गी लोगों को ईमानदार बने रहने का कारण मिलेगा. वैसे भी, लोगों की तीन श्रेणियां होती है, एक अल्पसंख्यक श्रेणी होती है जो चाहे जो भी हो जाये, ईमानदार बनी रहती है, दूसरी अल्पसंख्यक श्रेणी होती है जो चाहे जो भी हो जाये, बेईमानी से मुख नहीं मोडती. मगर, बहुसंख्यक श्रेणी ढुलमुल प्रवृति के लोगों की होती है जो हवा का रुख देख अपना रुख बदलते हैं. ऐसी श्रेणी के लिए दंड सबसे कारगर उपाय है. इनके लिए, तुलसीदास का कथन सत्य है कि –“भय बिन होही न प्रीत’.


आशा की इन छिटपुट किरणों से राहत तो मिल सकती है मगर भ्रष्टाचार को भारत से जड़ से  मिटाना हो तो बहुआयामी रणनीति की जरुरत पड़ेगी | इसके हर अंग पर एक साथ प्रहार करने पर ही इस रक्तबीज का अंत किया जा सकेगा | और इसकी शुरुआत ऊपर से ही करनी होगी अर्थात राजनीति से |

भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह भेद कैसे हो
राजनीतिक भ्रष्टाचार –
भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार अन्य भ्रष्टाचार को पोषित करने और प्रश्रय देने का सबसे बड़ा स्रोत है | अगर राजनीतिक आका ही भ्रष्ट हो तो फिर नीचे से क्या उम्मीद की जा सकती है |
इस भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सबसे पहले चुनावों में खर्च की पारदर्शी व्यवस्था करनी पड़ेगी | अभी राजनीतिक पार्टियाँ कॉर्पोरेट घराने से चंदा लिया करती है जिसके एवज में उन्हें भी जीतने पर इन घरानों को टैक्स छूट या फिर कुछ अन्य रेबड़ियां बांटनी पड़ती है | चुनावों में भारी खर्च की बाध्यता की वजह से ईमानदार और अच्छे लोग राजनीति से कतरा रहे हैं और संसद से लेकर विधान सभाओं तक बाहुबली और अपराधिक पृष्ठभूमि वाले अमीर लोगों का कब्ज़ा होता जा रहा है | राजनीतिक वंशवाद की भी इक बड़ी वजह यही है कि मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के वंशधरों को न तो पैसे की कमी है, न पहुँच की और न ही उनको कड़ी टक्कर देने के लिए ईमानदार लोग मैदान में आ रहे हैं |
निदान चुनाव सुधारों द्वारा चुनावी खर्च को न्यूनतम स्तर पर रखते हुए चुनावी खर्चों की सरकारी फंडिंग है | यह छोटा सा कदम भ्रष्टाचार मिटाने के लिए मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है |
साथ ही पंचायतों के स्तर से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सांसद एवं विधायकों की तरह पंचायत में चुने गए जनप्रतिनिधियों के लिए भी समुचित मानदेय की व्यवस्था होनी चाहिये |

साथ ही, भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर उसका समयबद्ध निपटारा होना चाहिये | इससे राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने में काफी मदद मिलेगी |

प्रशासनिक भ्रष्टाचार-
यह भ्रष्टाचार का सबसे दृश्य रूप है जिससे हम सबका साबका हर दिन पड़ता है | प्रशासनिक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए मुख्य सतर्कता आयुक्त की संस्था को और भी सशक्त किये जाने, राज्यों में समान संस्थाओं की स्थापना तथा उनका सुचारू रूप से कार्य करना अत्यावश्यक है | हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को स्वायत्त बनाने के निर्देश दिए हैं | अगर सीबीआई मुख्य सतर्कता आयुक्त के नियंत्रण में बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के कार्य करे तो इस निर्देश का पालन किया जा सकता है | साथ ही लोकपाल को लेकर भी हाल में व्यापक जन आन्दोलन रहा है | एक सशक्त लोकपाल जिसे प्रधानमंत्री से लेकर हर सरकारी सेवक, सांसद, विधायक और हर उस संस्था की जांच करने का अधिकार हो जो सरकार से मदद या अनुदान लेती हो तथा मुख्य सतर्कता आयुक्त एवं सीबीआई जिसके नियंत्रणाधीन कार्य करे, भ्रष्टाचार कि समस्या को हल करने में काफी कारगर हो सकती है | मगर लोकपाल की संस्था पर भी सम्यक नियंत्रण एवं संतुलन की आवश्यकता होगी |

जनसेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध करना भी सरकारी भ्रष्टाचार को रोकने में काफी कारगर है | “सेवा का अधिकार” के द्वारा कई राज्यों ने समयबद्ध सेवा पाने को जनता का मौलिक अधिकार बना दिया है | इससे भी प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर नकेल डालने में काफी सहायता मिलेगी |

पुलिस एवं न्याय व्यवस्था
पुलिस में भ्रष्टाचार में नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस सुधारों को सही ढंग से कार्यान्वित करना समय की मांग है | सबसे बड़ा सुधार FIR फाइल करने में पुलिस स्टेशन की मनमानी पर नियंत्रण लगाने का है |अभी देश के कई पिछड़े हिस्सों में पुलिस द्वारा FIR फाइल नहीं करने या फिर फाइल करने-न करने के लिए पैसे मांगने की ढेर सारी शिकायतें सामने आती है | अगर जनता को ऑनलाइन, मेल द्वारा, SMS द्वारा FIR फाइल करने का विकल्प दिया जाए तो इस पर काबू पाया जा सकता है | इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए झूठी FIR फाइल करने पर दंड का प्रावधान किया जा सकता है | इसके अलावा, हर केस के निपटारे के लिए चरणबद्ध समय सीमा बांधना भी अनिवार्य है |जाँच को स्वतंत्र बनाना भी इस दिशा में अच्छा कदम सिद्ध होगा |

न्याय व्यवस्था में सबसे बड़ा सुधार ब्रिटिश काल में बने कानूनों को वर्तमान युग की वास्तविकताओ के अनुरूप अद्यतन संसोधित करने का है | दीवानी और आपराधिक दंड संहिता की कई धाराओं में दंड की राशी देख कर हंसी आ जाती है | दंड को अपराध के अनुरूप और अपराधी के मन में भय पैदा करने वाला होना चाहिये | दुरूह और जटिल कानून न्याय पाने की राह में सबसे बड़ी बाधा है | साथ ही हर केस के निपटारे के लिए समयसीमा तय होनी चाहिये | न्याय प्रणाली को पूर्ण पारदर्शी और प्रभावी बनाये जाने की जरुरत है |  समुचित कोर्ट, पर्याप्त न्यायिक एवं गैर-न्यायिक कर्मचारी एवं लंबित मुकदमों का त्वरित निपटारा ही न्यायपालिका में जनता के विश्वास को बरक़रार रख सकता है |

भ्रष्टाचार के मुकदमों के लिए विशेष कोर्ट की व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम १९८८ को सम्यक रूप से कार्यान्वित किये जाने की जरुरत है | भ्रष्टाचारियों के मन से सजा का खौफ होना चाहिये | बिहार सरकार ने इस दिशा में भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त कर अनुकरणीय पहल की है |

सामाजिक सुधार
समाज और जनता को भी अपनी मानसिकता बदलने की जरुरत है | समाज अगर ईमानदारी की क़द्र न करेगा और पैसे को पूजेगा चाहे वह जैसे भी आया हो, तो वैसे समाज में ईमानदार होना बेमानी हो जाएगा |
समाज को अपनी मानसिकता को ईमानदार बनाना होगा | पैसे की कद्र छोड़ उसे व्यक्ति के गुणों की कदर फिर से सीखनी होगी | जुगाड़ से हमेशा आगे रहने वाले लोगों को उसे तिरस्कृत करना होगा | समाज को ईमानदारी को इक आदर्श और वांछनीय मूल्य के तौर पर आदर देना होगा | नहीं तो सामाजिक दवाबों में आकर ईमानदार लोग टूटते-बिखरते रहेंगे और बेईमान लोग ईमान की कीमत सरेआम लगते रहेंगे |

वाकई, भारत से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए समाज,शासन,साहित्य, मीडिया  अर्थात भारत राष्ट्र के हर अंग को अपने तरीके से लड़ाई लड़नी होगी | मीडिया और साहित्य को भी ईमानदारी के महत्त्व को जनता और समाज के सामने रखना होगा | मीडिया अगर खुद सरकारी विज्ञापन और पेड न्यूज़ के भ्रष्टाचारी मकडजाल में फंसा और साहित्यकार पुरस्कारों-पदों के लोभ में भ्रष्टाचारी सत्ता की चाटुकारिता करते रह गए तो समाज को जागरूक करने के महत्त कार्य के लिए कोई नहीं बचेगा | मीडिया और साहित्य को मशाल की तरह जनता को राह दिखानी होगी |
जनता को भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी और भ्रष्टाचारियों का सामाजिक बहिष्कार करना होगा | हमें अपने बच्चों-बच्चियों में ईमानदारी के संस्कार डालने होंगे | भ्रष्टाचार भारत की जीन में नहीं भारत के परिवेश में है और हमें इस परिवेश को स्वच्छ और ईमानदार बनाने के लिए हर संभव कदम उठाने होंगे | हमें माहौल की उस असहायता को मिटाना होगा जिसमे ईमानदार लोग यह सोचने पर मजबूर कर दिए जाते हैं कि –“क्या ईमानदार होना गुनाह है?”

इस निबंध के अंत में मैं सत्येन्द्र दूबे को समर्पित अपनी लिखी एक पुरानी कविता से करना चाहूँगा | मेरा विश्वास है कि अब भी ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है और अंत भले ही कितनी भी देर से आये पर अंत में सत्य की ही जीत होगी |

ईमान मर नहीं सकता
आज के इस भयानक दौर में,
जहाँ ईमान की हर जुबान पर
खामोशी का ताला जडा है.
चाभी एक दुनाली में भरी
सामने धरी है ,

फ़िर भी मैं कायर न बनूँगा
अपनी आत्मा की निगाह में
फ़िर भी मैं, रत्ती भर न हिचकूंगा
चलने में ईमान कि इस राह पे।

मैं अपनी जुबान खोलूँगा
मैं भेद सारे खोलूँगा-
(बेईमानों- भ्रष्टाचारियों की
काली करतूतों के )
मैं चीख-चीख कर दुनिया भर में बोलूँगा-
ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।

मैं जानता हूँ कि परिणाम क्या होगा-
मेरी जुबान पर पड़ा खामोशी का ताला
बदल जाएगा फांसी के फंदे में
और फंदा कसता जायेगा-
भिंच जायेंगे जबड़े और मुट्ठियाँ
आँखें निष्फल क्रोध से उबलती
बाहर आ जाएँगी
प्राण फसेंगे, लोग हसेंगे
पर संकल्प और कसेंगे.

देह मर जायेगा मगर
आत्मा चीखेगी, अनवरत, अविराम-
''ईमान झुक नहीं सकता,
ईमान मर नही सकता,
चाहे हालत जो भी हो जाये,
ईमान मर नही सकता,
ईमान मर नही सकता.
-2004 -

(स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में भष्टाचार को उजागर करने पर जान से हाथ धोने वाले 'यथा नाम तथा गुण' सत्येन्द्र डूबे तथा ईमान की हर उस आवाज को समर्पित जिसने झुकना गवारा ना किया बेईमानी के आगे.)
----केशवेन्द्र कुमार---

(निबंध में व्यक्त विचार लेखक की निजी सोच को प्रदर्शित करते हैं | निबंध यूपीएससी के अभ्यर्थियों और अन्य छात्रों के मार्गदर्शन के लिए लिखा गया है | )